हरिद्वार/मुज़फ्फरनगर।
*कांवड़ मेले की व्यवस्था को लेकर अब तक शासन-प्रशासन की छह से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं। उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली के आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं। परंतु नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही निकला है। जहां उत्तरप्रदेश के अधिकारियों ने कानफोडू डीजे पर पाबंदी लगाने से मना कर दिया है, वहीं सूत्रों की माने तो कई भाजपा विधायकों के दबाव में उत्तराखंड में भी डीजे पर लगी पाबंदी पुलिस प्रशासन को हटाने को मजबूर होना पड़ा है!। कुल मिलाकर प्रशासन उच्चतम न्यायालय के ध्वनि प्रदूषण के नियमों का पालन कराने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है।*
*प्रशासन ने छह फुट से ऊंची कावड़ लाने पर पाबंदी लगा दी है और जो कावड़िए छह फुट से ज्यादा ऊंची कांवड़ लेकर आएंगे, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। इसके बावजूद कांवड़िए 10-12 फुट से बड़ी कांवड़ लेकर हरिद्वार आ रहे हैं हरिद्वार से नारसन तक जाने वाली नहर पटरी करीब 67 किलोमीटर लंबी है, परंतु उसे ठीक करने में प्रशासन नाकाम रहा है। जिलाधिकारी हरिद्वार ने सिंचाई विभाग उत्तराखंड को नहर पटरी को कांवड़ मेले से पहले ठीक करने के आदेश दिए थे। परंतु सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने यह आदेश रद्दी की टोकरी में डाल दिए हैं। नहर पटरी के अलावा मुजफ्फरनगर से हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग में जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे हो रहे हैं। 10 साल से यह राष्ट्रीय राजमार्ग अधूरा पड़ा है।*
*मेले के दौरान हरिद्वार के जिलाधिकारी ने तीन से नौ अगस्त तक जिले के सभी स्कूल-कॉलेज बंद रखने के आदेश दिए हैं। वहीं भारी वाहनों का आवागमन भी नहीं हो सकेगा। इससे हरिद्वार के सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र में 300 से ज्यादा लगे उद्योगों में माल की ढुलाई और सप्लाई का काम 15 दिन तक बंद रहेगा। सिडकुल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष हरेंद्र गर्ग का कहना है कि कांवड़ मेला के दौरान न तो हरिद्वार सिडकुल क्षेत्र में माल आ पाता है और न ही बाहर भेजा जा सकता है।*
*हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक कांवड़ मेला*
कांवड़ मेला हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक माना जाता है। बिजनौर, मुजफ्फरनगर और मेरठ से मुसलिम समाज के लोग कांवड़ बनाने का काम हरिद्वार में आकर करते है। हरिद्वार की उपनगरी ज्वालापुर में मुसलिम समाज के लोग कांवड़ियों के लिए खाने-पीने के पंडाल लगाकर उनके ठहरने और उनके स्वागत सत्कार करने का जिम्मा हर साल उठाकर हिंदू-मुसलिम एकता की मिसाल पेश करते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता राव आफाक का कहना है कि कांवड़िए हमारे भाई हैं। उनका स्वागत करना हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का एक उदाहरण है।